Thursday, 28 October 2010

परमाणु व्यापार की चकाचौंध

भारत-अमरीका परमाणु करार पूरा हो चुका है, अब आगे क्या होगाक् पिछले तीन सालों से सरकार पौराणिक किरदार अर्जुन की तरह करार पर निगाहें टिकाए हुए थी। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भी अपने अटूट समर्पण आत्मसंतुष्टि है। अमरीकी राष्ट्रपति बुश भी कडे विरोध के बावजूद करार को मंजूरी दिलाने में कामयाबी से प्रफुल्लित हैं। सिंह और बुश दोनों कार्यकाल के अंतिम दौर में हैं और उनके लिए यह करार उनकी विदेश नीति की सबसे बडी उपलब्धि होगी। भारत में कहानी तब तक
 खत्म नहीं होगी जब तक कि उत्तराधिकारी सरकारें इस करार को आगे ले जाकर इसके लाभ ना लें। जिस तरह से फ्रांस और अमरीका ने सिंह की भव्य मेजबानी की, वह वैश्विक परमाणु व्यापार में भारत के बढते प्रभाव का संकेत है। प्रधानमंत्री के अमरीका और फ्रांस दौरे ने गत सप्ताह एक बार फिर परमाणु करार पर ध्यान केन्द्रित करा दिया। कुछ लोग परमाणु करार को पिछले छह दशकों से अमरीका की एशियाई रणनीति में भारत को शामिल करने के प्रयास के रूप में देखते हैं। भारत को एक विकासशील लोकतंत्र के तौर पर क्षेत्र में चीन से प्रतिद्वंदिता के लिए एक बडी शक्ति के रूप में पेश किया जा रहा है। उदारीकरण और समृद्धिशील मध्यम वर्ग ने भारत के बारे में अमरीका और अन्य पश्चिमी शक्तियों की रूचि जगाई है। सन् 2000 में राष्ट्रपति क्लिंटन की नई दिल्ली यात्रा के बाद दोनों देशों के संबंध प्रगाढ होने लगे और राष्ट्रपति बुश ने इन्हें आगे बढाते हुए परमाणु करार तक पहुंचा दिया। यद्यपि वास्तविक कारण भारत के साथ रणनीतिक साझेदारी है और परमाणु करार इसका एक हिस्सा मात्र है। इसके साथ ही रक्षा सहयोग, उ“ा तकनीक स्थानांतरण जैसे अन्य मुद्दे और फायदे भी हैं। इन सबसे ऊपर अमरीका और उसके सहयोगियों का शक्तिशाली समर्थन है, जो परमाणु करार की सौदेबाजी के दौरान आईएईए और एनएसजी में नजर आई।
परमाणु करार पर भारत में राजनीतिक प्रक्रिया अब भी क्लेशकर ही चल रही है। विपक्ष लगातार प्रधानमंत्री पर "बिक जाने" का ताना कस रहा है। कांग्र्रेस के नेतृत्व वाला संप्रग छह राज्यों में होने वाले आगामी चुनावों में इसका फायदा उठाने की उम्मीद कर रहा है। दरअसल वामदल लगातार बढते दोतरफा और बहुपक्षीय सैन्य संबंधों तथा दोनों देशों के संयुक्त सैन्य अभ्यासों का बारम्बार जिक्र करते हुए भारत की विदेश नीति पर बंदिशें स्वीकार करने का आरोप लगा रहे हैं। इसके लिए वे अमरीका की परेशानी का कारण बने ईरान जैसे देशों पर भारत की नीति की मिसाल देते हैं। भाजपा ने परमाणु समझौते की प्रतिक्रिया शुरू की थी, अत: वह कांग्रेस को इसका लाभ नहीं उठाने देना चाहती। बसपा सुप्रीमो मायावती इस मामले में राजग के साथ हैं। दूसरी तरफ नए सहयोगी सपा के साथ ही संप्रग के अन्य घटक दल इसके समर्थन में हैं। कांग्र्रेस के लिए अब इसे लोगों तक ले जाना एक बडी चुनौती है वहीं आम जनता महंगाई और दहशतगर्दी के खौफ जैसे अन्य मुद्दों से अधिक चिंतित है।
जहां एक तरफ इसके राजनीतिक पक्ष को सम्भालने की चुनौती है, वहीं दूसरी तरफ सरकार के लिए इसे वैश्विक स्तर पर गतिशील बनाना और भी बडी चुनौती है। भारत के दरवाजे पर एक बडा मौका दस्तक दे रहा है जिसे छोडना नहीं चाहिए। परमाणु करार ने अमरीका, रूस, फ्रांस और चीन जैसे कई अन्य देशों में भी व्यापारिक रूचि पैदा की है। ये सभी भारत के साथ 100 अरब डॉलर के परमाणु व्यापार के लिए कतार में लगे हैं। भारत को परमाणु व्यापार से अधिकाधिक लाभ उठाने के लिए कडी सौदेबाजी करनी चाहिए। पिछले कुछ महीनों में जनरल इलैक्ट्रिकल, बेकटेल, एडलो इंटरनेशनल, वेस्टिंगहाउस जैसी कई अमरीकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने ऊर्जा अनुबंधों के लिए नई दिल्ली में अपने शीर्ष अधिशासी तैनात कर दिए हैं। अमरीकी कम्पनियां सोचती हैं कि भारत में 1200-1200 मेगावाट के 30 परमाणु संयंत्रों के अनुबंध देतेसमय उन्हें उतना लाभ नहीं मिल पाएगा जितना वे चाहती हैं। वे इस बात से व्यथित हैं कि अमरीकी कांग्र्रेस में विधेयक पारित होने में देरी के कारण वे फ्रांसीसी बहुराष्ट्रीय कम्पनियों से पीछे रह गए। रूसी भी अपने प्रस्तावों के साथ तैयार हैैं जिन पर दिसम्बर में वहां के राष्ट्रपति के नई दिल्ली आने पर हस्ताक्षर किए जाने की सम्भावना है।
असैन्य नाभिकीय ऊर्जा के क्षेत्र की लगभग 35 फ्रांसीसी कम्पनियां पिछले साल से ही भारतीय कम्पनियों के साथ बातचीत कर रही हैं। फ्रांसीसी और रूसी कम्पनियां जैसे अरेवा एनपी, एसएएस, एटमएनर्गोप्रोएक्ट और जेडएओ एटम्सट्रॉयएक्सपोर्ट आदि सौदेबाजी में पहले ही आगे चल रही हैं। यहां तक कि चीन ने भी भारत के साथ व्यावसायिक परमाणु सम्बन्ध बढाने में रूचि दिखाई है। क्या भारत तकनीकी स्थानांतरण के लिए तैयार हैक् भारतीय कॉर्पोरेट लॉबी, वैश्विक कम्पनियों के साथ व्यापार के लिए तैयार हो रही है। वर्तमान में भारत 2400 मेगावाट परमाणु ऊर्जा उत्पादित कर रहा है। भारत में परमाणु ईंधन की उपलब्धता काफी कम है और देशी स्त्रोतों से ज्यादा से ज्यादा 10,000 मेगावाट उत्पादन हो सकता है जबकि देश में न्यूनतम 40,000 मेगावाट परमाणु ऊर्जा की आवश्यकता है। यह कमी अमरीका, ऑस्ट्रेलिया और अन्य देशों से ईंधन के आयात से ही पूरी की जा सकती है। सबसे ऊपर भारतीय ऊर्जा संयंत्रो में नए प्राण फूं कने या उन्हें बदलने की जरूरत है। भारत के मौजूदा परमाणु बिजलीघर देश की कुल ऊर्जा जरूरत का सिर्फ 4 प्रतिशत ही उत्पादित कर पाते हैं। सिंह ऊर्जा सुरक्षा की अवधारणा तथा इसमें आगे रहने की जरू रत देश को समझाना चाहते हैं। भारत के पास इस समय 4120 मेगावाट की कुल संस्थापित क्षमता वाले 17 परमाणु बिजलीघर हैं। अनिल अम्बानी के नेतृत्व वाली रिलायन्स पावर के साथ ही न्यूक्लियर पावर कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया और भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स जैसी भारतीय कम्पनियां परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में अपनी उपस्थिति बढाने के लिहाज से अगले पांच सालों में एक लाख करोड रूपए के निवेश की योजना बना रहे हैैं। इसके अलावा लार्सन एंड टूब्रो तथा कुछ अन्य कम्पनियां ऊर्जा क्षेत्र में आने की तैयारी कर रहे हैं। वर्तमान परमाणु बिजलीघर ईंधन की कमी और आयात नहीं होने से आधी क्षमता पर चल रहे हैैं। दो तरफ के उपयोग की तकनीकों का आयात किया जा सकता है लेकिन स्वच्छ परमाणु ऊर्जा संयंत्र बनाने में लगभग एक दशक का समय लगता। लाख टके का सवाल यह है कि क्या हमें वास्तव में दो तरह के उपयोग की तकनीकें या मिलेंगी या कि जब ऎसा समय आएगा, क्या परमाणु शक्तियां हमें वह नहीं दे पाएगी जिसकी हमें जरूरत है। परमाणु कहानी तब तक पूरी नहीं होती जब तक कि परमाणु व्यापार संबंधी समझौते पूरे नहीं होते। यह काफी बडा व्यापार है। बहुत कुछ इस पर निर्भर करेगा कि कितनी जल्दी भारत यह चाहता है और कितनी सफलता से सिंह आर्थिक राजनय चला पाते हैं।
परमाणु करार ने अमरीका, रूस, फ्रांस और चीन जैसे कई अन्य देशों में भी व्यापारिक रूचि पैदा की है। ये सभी भारत के साथ 100 अरब डॉलर के परमाणु व्यापार के लिए कतार में लगे हैं। भारत को परमाणु व्यापार से अधिकाधिक लाभ उठाने के लिए कडी सौदेबाजी करनी चाहिए
कल्याणी शंकर
[लेखिका वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक हैं]

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