Thursday, 28 October 2010

परमाणु करार लागू अब आगे?

 अमेरिका भारत को विशेष रूप से अपने लिए एक बड़े परमाणु बाजार में तब्दील करने में सफल हो चुका है। जैसा कि पहले ही उल्लेख किया जा चुका है भारत ने अमेरिका को यह राजनीतिक भरोसा दिलाया है कि वह उसके लिए अपने आण्विक व्यवसाय का 50 प्रतिशत आरक्षित रखेगा। इस बात का संकेत एनएसजी से मिली राहत के तीन दिनों के भीतर ही आयी अमेरिकी विदेश मंत्री कोंडलीजा राइस के उस बयान से भी मिलता है जिसमें उन्होंने मांग की थी कि भारत अमेरिकी हितों का ख्याल रखे और जब तक अमेरिकी कांग्रेस 123 करार को पारित नहीं करती तब तक अमेरिकी एनएसजी के अन्य सदस्यों के साथ द्विपक्षीय व्यापार नहीं शुरू करे।

परमाणु करार लागू हो गया है। भारत राज्य के साथ-साथ देश की जनता के लिए ऐतिहासिक एवं राजनीतिक महत्ववाले इस राजनीतिक तमाशे का आखिरी अध्याय भी लिखा जा चुका है। अमेरिकी कांग्रेस ने 123 समझौते को 2 अक्टूबर, 2008 को 13 के मुकाबले 8़6 मतों से पारित कर दिया। अमेरिकी राष्ट्रपति तथा दोनों देशों के विदेश मंत्रियों के हस्ताक्षर भी इस करार पर हो गए हैं। इससे पहले न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप (एनएसजी) ने भी भारत के साथ आण्विक व्यापार पर 16 वर्षों से लगे हुए प्रतिबंध को हटा लिया था। लेकिन ठहरिए, दुनिया के सुपर मठाधीश अभी भी भारत के साथ एक संपूर्ण प्रभुसत्ता संपन्न आण्विक अस्त्र राज्य जैसा व्यवहार नहीं कर रहे हैं। अमेरिकी कांग्रेस ने एक संशोधन द्वारा इस संबंध में पूर्व सूचना दे दी है कि अगर भारत परमाणु विस्फोट करता है तो यह समझौता बाध्यकारी नहीं रह जाएगा। इससे पहले एनएसजी ने भी एनपीटी और सीटीबीटी समझौते पर हस्ताक्षर किए जाने की बात की थी। अबतक `भारत´ शब्द की पहचान `भारतीय राज्य´ के साथ `भारतीय जनता´ के रूप में भी होती रही है लेकिन आज भारतीय राज्य भारतीय जनता के साथ जुड़ा हुआ नहीं रह गया है। `भारतीय राज्य´ और `भारतीय जनता´ के हित मौलिक रूप से एक समान नहीं रह गए हैं। और अपने अंतिम रूप में 123 समझौते ने `भारतीय जनता´ क मुकाबले `भारतीय राज्य´ को मजबूत कर दिया है। इस तरह पिछले 60 वर्षों की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए भारतीय राज्य भारतीय जनता के हित की कीमत पर फले-फूललेगा। आण्विक भारतीय राज्य के अधीन देश की करोड़ों जनता बेघर, भूखी और नाउम्मीद बनी रहेगी।
भारतीय जनता अभी भी भारतीय राज्य की आण्विक अस्पृश्यता की समाप्ति की कीमत चुकाने से मना कर सकती है। उसे संसद से अवश्य ही यह मांग करनी चाहिए और युपीए से यह कहना चाहिए कि वह इस करार को अमली जामा न पहनाए। इस मांग के कुछ खास कारण हैं। सबसे पहला तो अमेरिकी सिनेट द्वारा पारित 123 करार के साथ जोड़ा गया संशोधन है। अतंरराष्ट्रीय कानून में इस संशोधन की हैसियत `आरक्षण´ वाली है। सबसे अच्छी बात यह होगी कि भारत इस संशोधन के प्रति अपना विरोध दर्ज करे जिसकी भी अंतरराष्ट्रीय कानून में अपनी हैसियत है। अगर सरकार ऐसा नहीं करती तो फिर जनता को यह मांग करनी चाहिए कि करार को अमल में न लाया जाए। दूसरे इससे आगे की जटिलताओं तथा नुकसानों से बचा जा सकेगा। इस व्यवस्था के संबंध में अलग-अगल सोच एवं व्याख्याएं हैं। भारतीय जनता तात्कालिक नुकसान से बच जाएगी। ऐसी खबर है कि युपीए सरकार ने अमेरिका को यह राजनीतिक आश्वासन दिया है कि भारत की आण्विक तकनीक की आयात जरूरतों का 50 फीसदी अमेरिकी व्यावसायिक कंपनियों के लिए सुरक्षित रहेगा और शेष रूस तथा फ्रांस सहित 44 एनएसजी देशों के लिए होगा।
तीसरा कारण यह है कि आण्विक ऊर्जा से सबंधित 123 करार ऊर्जा क्षेत्र में भारत की कमियों को पर्याप्त रूप से दूर नहीं करेगा। जानकार सूत्रों का मानना है कि इस करार के बाद भी अगले दशक में भारत आण्विक शक्ति से मिलने वाली बिजली से अपनी ऊर्जा जरूरतों का महज 3-4 प्रतिशत ही पूरा कर पाएगा। इस छोटे से फायदे के लिए इतना सारा खतरा क्यों उठाया गया है? कोई भी विवेकपूर्ण सरकार इस तरह का निर्णय नहीं ले सकती जबतक कि यूपीए सरकार की तरह उसके अमेरिका के साथ अन्य बाध्यकारी राजनीतिक एवं मनोवैज्ञानिक सामरिक संबंध न हों। यहां गौरतलब है कि युपीए सरकार लोगों को भ्रम में डाल रही है। उसने एक व्यापक अभियान चला रखा है कि परमाणु समझौते के बाद सरकार ग्रामीण भारत के घर-घर में बिजली पहुंचाने में सक्षम हो जाएगी। वह `अंधेरा हटाओं रोशनी लाओ´ जैसा नारा लेकर आई है जो सत्तर के दशक के उस `गरीबी हटाओ´ वाले नारे की याद दिलता है जिसके द्वारा देश की जनता को मूर्ख बनाया गया था।
हम इस संदर्भ में कुछ सवाल करना चाहते हैं कि परमाणु परीक्षण करने के अधिकार को कायम रखने के प्रति भारत सरकार का रवैया कैसा रहा। इन प्रयासों पर गौर कीजिए जो विएना में `स्पष्ट एवं बिना शर्त छूट´ हासिल करने के लिए भारत द्वारा अंतिम समय तक किए जाते रहे। अगस्त महीने से ही जर्मनी भारत से निरस्त्रीकरण तथा नॉन-प्रोलिफरेशन पर अपनी स्थिति स्पष्ट करने से संबंधित बयान देने के लिए कह रहा था। अगस्त के मध्य में जर्मनी के विदेश मंत्री ने प्रणव मुखजी से बात की और एक पत्र में इस प्रस्ताव को दुहराया। भारत ने इस संबंध में सकारात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त की। जर्मन सरकार ने दिल्ली के सामने एक और सुझाव रखा जिसमें एनएसजी के सभी 45 सदस्यों को इसी तरह का पत्र लिखने की बात की गई थी। डच राजनयिक ने भी भारत से नॉन-प्रोलिफरेशन को लेकर अपनी प्रतिबद्धता जाहिर करता हुआ राजनीतिक बयान देने को कहा। 5 सितंबर को जब एनएसजी में बहस अपने निर्णायक दौर में थी तक विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी न एक बयान दिया जिसमें परमाणु परीक्षणों पर भारत द्वारा लगाई गई स्वैच्छिक एवं एकतरफा रोक तथा परमाणु हथियारों का पहला इस्तेमाल न करने की नीति पर जोर दिया गया था। विश्वस्त राजनयिक सूत्रों के अपुसार यह बयान एनएसजी से छूट हासिल करने में निर्णायक साबित हुआ। एनएसजी के सदस्यों ने प्रवण मुखर्जी के बयान के राजनीतिक तत्व का स्वागत किया। इस अवसर पर नॉर्वे, हालैंड तथा अन्य सदस्यों ने पैराग्राफ 3 में भारतीय बयान का जिक्र किए जाने का सुझाव दिया। इस पर पहले को भारत ने सावधानी पूर्वक प्रतिक्रिया व्यक्त की लेकिन आखिरकार वह अमेरिका तथा छह प्रस्तावकों के साथ यहमत हो गया। पैराग्राफ दो में भारत के आश्वासन और पैराग्राफ तीन में एनएसजी के फैसले को मिलाकर यह कहा गया कि ``ऊपर दिए आश्वासनों एवं कार्रवाइयों के आधार पर जैसाकि 5 सितंबर 2008 को भारत द्वारा दोहराया गया है राष्ट्रीय स्थिति के प्रति पूर्वाग्रह के बगैर सहभागी सरकारों ने स्वीकार किया है और वे नागरिक आण्विक सहयोग से संबंधित निन्नलिखित नीतियों को लागू करेंगी- (भारत के साथ) ``यहां तक कि अमेरिकी सीनेट ने भी परमाणु समझौते के जिस दस्तावेज को स्वीकृति दी है उसमें भी प्रणव मुखर्जी के बयान को संज्ञान में लिया गया है।
इस सच्चाई से इंकार नहीं किया जा सकता कि अमेरिकी सिनेट ने एनएसजी में प्रणव मुखर्जी द्वारा किए गए राजनीति आश्वासन के आधार पर ही 123 कानून को पारित किया है जो कि संसद एवं जनता से किए गए वायदे का उल्लघंन है। दूसरा सवाल यह है कि करार को लागू करने को लेकर इस तरह की जल्दबाजी और बेचैनी का प्रदर्शन क्यों किया गया? व्हाइट हाउस और स्टेट विभाग ने भारत और अंतरराष्ट्रीय समुदाय के बीच के इस करार के लिए अथक प्रयास किए। तीन दिनों तक जारी रही बातचीत के दौरान राष्ट्रपति बुश और विदेश मंत्री कोंडेलिजा राइस ने कई बार चीन, आयरलैंड, आस्ट्रिया तथा अन्य देशों के नेताओं से बात की। इन प्रयासों के संबंध में इस आग्रह के साथ मीडिया को बताया गया कि बातचीत की समाप्ति के बाद ही उनको प्रसारित किया जाएगा या छापा जाएगा। कोई अन्य देश ऐसा नहीं कर सकता था।
यह अतिरिक्त उत्साह सिर्फ अमेरिकी राजनयिकों तक ही सीमित नहीं था। विएना में वरिष्ठ भारतीय राजनयिकों का व्यवहार जूनियर यूरोपीय अधिकारियों के सामने भी घिघियाने जैसा ही था। उन्होंने एनएसजी से हर कीमत पर छूट हासिल करने के लिए एक तरह से नैराश्यपूर्ण चापलूसी´ का प्रदर्शन किया। ऐसे मे यह सवाल तो उठता ही है कि अमेरिकी और भारतीय नेता इसमें इस तरह की अस्वाभाविक रूचि क्यों ले रहे थे? इसका संबंध परहितवाद से नहीं था बल्कि यह पूर्व नियोजित राजनीतिक वचनवद्धता तथा कठोर आंकलनों पर आधारित था जो कि भारतीय जनता के हितों के विरूद्ध है। जानकार सूत्रों के अनुसार इस करार के साथ जुड़ा हुआ पहला महत्वपूर्ण काकर्षण यह था कि यह `मल्टी-बिलियन-न्यूिक्लयर कॉमर्स´ के दरवाजे खोल देगा जिससे भारतीय राज्य के सत्ताधारी वर्गों को फायदा होगा जबकि छोटे, सीमांत तथा भूमिहीन किसानों के हितों के साथ इसका कोई भी लेना-देना नहीं होगा। यह अमेरिका एवं भारत में बड़े व्यावसायिक निवेशों को प्रोत्साहित करेगा।
उदाहरण के लिए 123 समझौता इस बात की व्यवस्था करता है कि उद्योगों, उपयोगिताओं एवं उपभोक्ता क्षेत्र में दोनों पक्ष आपसी हित में एक दूसरे के साथ आिण्वक व्यवसाय में संलग्न होंगे। जीई और वेस्टिंग हाउस अमेरिकी एवं वैश्विक आण्विक उद्योग के बड़े खिलाड़ी हैं। 123 समझौते की धारा 14 भारत के विशाल ऊर्जा बाजार में जीई की भागीदारी की व्यवस्था करती है। बड़े व्यवसाय भारत को अपना बड़ा बाजार बनाने को उत्सुक हैं। न्यूक्लियर पावर कॉरपोरेशन के अध्यक्ष एवं महानिदेशक एके जैन के अनुसार अगले 11 से 15 वर्षों के दौरान भारत 24 आयातित नागरिक आण्विक लाइट वाटर रिएक्टर स्थापित करेगा।
एनएसजी से मिली छूट वास्तव में एक वैश्विक अवसर है। चूंकि भारत आण्विक व्यवसाय के लिए अपने दरवाजे खोल देगा तो इससे 40 विलियन डॉलर के विश्वव्यापी व्यवसाय की शुरूआत होगी, भारतीय कपंनियों को विदेशी परमाणु संयंत्र निर्माताओं के लिए कलपूर्जो की आपूर्ति का अवसर मिलेगा, भारतीय फर्मों को ऊर्जा उत्पादन अवसर हासिल होगा तथा देश में परमाणु ऊर्जा स्तर बढ़ेगा। ऊर्जा क्षेत्र के बड़े खिलाड़ी जीएमआर एनर्जी ने घोषित किया है कि वह अगले 5-7 वर्षों में 2000-3000 मेगावॉट क्षमता वाले परमाणु ऊर्जा संयंत्र की स्थापना में लगभग 10,000 करोड़ लगाएगा। कंपनी उपकरण एवं ईंधन आपूर्तिकर्ताओं के साथ बातचीत शुरू भी कर चुकी है और अगले साल भर में जमीनी स्तर पर उपयुक्त कार्यान्वयन की योजना को अंतिम रूप दे देगी। एनएसजी से मिली छूट से उत्साहित होकर ब्रिटिश परमाणु ऊर्जा उद्योग का शिष्टमंडल 100 बिलियन डॉलर के इस बाजार का अध्ययन करने के लिए भारत की यात्रा पर आ भी चुका है।
इस पूरे मामले का सबसे दुर्भाग्यपूर्ण पक्ष यह था कि भारत ने पूरी तत्परता दिखाते हुए राइस की इस मांग को स्वीकार कर लिया। विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी ने सार्वजनिक रूप से अन्य देशों के संदर्भ में अमेरिकी हित सुनिश्चित किए जाने का आश्वासन दिया। यहां तक कि भारतीय विज्ञान नौकरशाही भी अमेरिकी निवेश लाने का लेकर उत्सुक थी। इसी तरह भारत का कारपोरेट सेक्टर भी इसे लेकर उत्साहित है। कॉनफेडेरेशन ऑफ इंडियन इंडस्ट्री (सीआईआई) के महानिदेशक चंद्रजीत बनर्जी ने कहा कि ``एनएसजी से मिली छूट के बाद अंतरराष्ट्रीय समुदाय विशेष रूप से उच्च तकनीक व्यवसाय के क्षेत्र में भारत के साथ जुड़ सकेगा और भारतीय उद्योगों को विश्व के आण्विक ऊर्जा संयंत्रों के लिए कल पर्जे तथा कंपोनेंट्स की आपूर्ति का अवसर मिलेगा। इसके अलावा भारतीय ऊर्जा संयंत्र निर्माण कंपनियों के लिए भी व्यवसाय के अवसर बढ़ेंगे।´´ इसके अलावा भारत और अमेरिका उच्च तकनीकी क्षेत्र में भी सहयोग बढ़ाने के लिए कार्य योजना तैयार कर चुके हैं। निजी क्षेत्रों की सहभागिता बढ़ाने के प्रयास भी हो रहे हैं। आण्विक ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष अनिल काकोदकर यह कह चुके हैं कि सरकार आण्विक ऊर्जा कानून में संशोधन कर सकती है। गौरतलब है कि यह क्षेत्र अबतक सरकारी उ़द्यमों के लिए ही सुरक्षित था। जाहिर है यह सब भारत की जनता के हितों की कीमत पर भारतीय राज्य के समर्थकों एवं सहयोगियों को फायदा पहुंचाने के लिए ही किया जा रहा है।
साभार  _ visfot.com

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