Monday, 24 December 2012

परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह अर्थात एनएसजी से मिली छूट का अभिप्राय


परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह अर्थात एनएसजी से मिली छूट का अभिप्राय भारत को अंतरराष्ट्रीय परमाणु अप्रसार संधि के दायरे में लाना है। हाइड एक्ट की तरह एनएसजी से मिलने वाली छूट के भी भारत के लिए गंभीर निहितार्थ हैं। हमारी नवोदित परमाणु निवारक क्षमता और व्यापक सामरिक स्वायत्तता, दोनों पर इसका दुष्प्रभाव पड़ेगा। एनएसजी में भारत की शुभेच्छा से की गई घोषणा को बहुपक्षीय वैधानिकता के जाल में फंसा लिया गया है और भारत को परमाणु हथियार विहीन राष्ट्रों पर थोपी जाने वाली शर्तो के दायरे में खींच लिया गया है। सैन्य उद्देश्य के लिए कुछ परमाणु सुविधाओं की छूट के अलावा तमाम प्रयोजनों तथा उद्देश्यों के लिए एनएसजी ने भारत को परमाणु हथियार विहीन राष्ट्रों के रूप में मान्यता दी है। इस प्रकार भारत पर परमाणु अप्रसार शर्ते भी लागू हो जाएंगी। यह प्रावधान हाइड एक्ट में भी सम्मिलित है।
अब भारत को परमाणु अप्रसार की वचनबद्धता निभानी होगी और परमाणु हथियार विहीन राष्ट्रों पर लागू तमाम प्रावधानों का पालन करना होगा। इनमें परीक्षण भी शामिल है। परीक्षण पर एकपक्षीय रोक अब परमाणु आपूर्ति समूह के तमाम सदस्यों के साथ असैन्य परमाणु सहयोग की कठिन शर्त में बदल गई है। वास्तव में भारत में परमाणु आपूर्ति को भाग-1 और भाग-2 से संबद्ध करके एनएसजी ने एक व्यापक परमाणु अप्रसार जाल बिछा दिया है। उदाहरण के लिए, एनएसजी दिशानिर्देशों के भाग-2 के पैरा 4 के अनुसार आपूर्तिकर्ता राष्ट्र को किसी भी प्रकार के हस्तांतरण से पहले यह ध्यान रखना है कि प्राप्तकर्ता राष्ट्र की नीतियां, बयान और क्रियाकलाप परमाणु अप्रसार के समर्थन में हों और प्राप्तकर्ता राष्ट्र अप्रसार के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन करता हो। भारत-अमेरिकी करार 123 तथा इसके बाद अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी से मिली छूट ने भारत को परमाणु अप्रसार संधि के दायरे में लाने का मार्ग प्रशस्त कर दिया है। एनएसजी बैठक के बाद आस्ट्रिया का कहना था कि भारत को मिली छूट अंतरराष्ट्रीय परमाणु अप्रसार के नियमों के अनुरूप है। भेदभावपूर्ण असैन्य परमाणु निर्यात नियंत्रण से छूट हासिल करने के प्रयास में नई दिल्ली भेदभावपूर्ण व्यवहार और मानकों के एक नए जाल में फंस गई है। भारत को मिली छूट तीन चक्रीय शर्तो पर आधारित है। पहली शर्त है कि नई दिल्ली 18 जुलाई, 2005 के अपने वचन पर कायम रहे। दूसरे, भारत अपने विदेश मंत्री के 5 सितंबर, 2008 के बयान पर टिके, जिसमें कहा गया था कि परीक्षण पर स्थगन जारी रहेगा। भारत परमाणु हथियार समेत सभी प्रकार के हथियारों की दौड़ में शामिल नहीं होगा और सामरिक स्वायत्तता को वैश्विक जिम्मेदारी की भावना के साथ जारी रखेगा। तीसरी शर्त है कि एनएसजी के दिशानिर्देशों के तमाम प्रावधान लागू होंगे। इसमें भारत को केवल एक छूट मिली है कि अंतरराष्ट्रीय निरीक्षक प्रत्येक परमाणु सुविधा की जांच नहीं कर सकेंगे। हालांकि भारत को होने वाली आपूर्ति अंतरराष्ट्रीय परमाणु निगरानी वाले परमाणु केंद्रों को ही होगी, किंतु जैसे हाइड एक्ट भारत में बहुराष्ट्रीय या अमेरिकी निरीक्षण वाली सुविधाओं को छोड़कर शेष असैन्य परमाणु पुर्नसंस्करण, संवर्धन और भारी जल प्रौद्योगिकी संबंधी निर्यात प्रतिबंधित करता है, उसी प्रकार एनएसजी छूट के दायरे में भी इस प्रकार के निर्यात नहीं आते।
हाइड एक्ट की धारा 103 (ए)(5) प्रशासन से मांग करती है कि यूरेनियम के संवर्धन, खर्च किए गए परमाणु ईधन के पुर्नसंस्करण और भारी जल के उत्पादन से संबद्ध प्रौद्योगिकी और उपकरणों की विशेष संवेदनशीलता को देखते हुए एनएसजी के सदस्यों के साथ इस प्रकार की प्रौद्योगिकी और उपकरणों का हस्तांतरण आगे प्रतिबंधित करे। यह हस्तांतरण भारत को भी नहीं हो सकेगा। आज, इस बात की कल्पना भी नहीं की जा सकती कि करार पूर्ण असैन्य परमाणु ऊर्जा सहयोग है और इससे भारत को भी वही फायदे मिलेंगे जो अमेरिका को हासिल हैं, किंतु अमेरिका को दोष क्यों दिया जाए? करार के लिए बेकरार मनमोहन बार-बार गोल पोस्ट का स्थान बदलते रहे हैं। उदाहरण के लिए उन्होंने 17 अगस्त, 2006 को संसद को दिए गए इस वचन को तोड़ दिया कि करार से असैन्य परमाणु ऊर्जा संबंधी सहयोग और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के तमाम पहलुओं से प्रतिबंध हट जाएगा। उन्होंने आगे कहा था कि हम ऐसी किसी भी शर्त पर सहमत नहीं होंगे, जो हमें पूर्ण असैन्य परमाणु सहयोग के लाभ हासिल करने से रोके। मनमोहन सिंह 29 जुलाई, 2005 को लोकसभा में किए गए वादे से भी पलट गए। उन्होंने कहा था, ''हम अमेरिका के समान ही जिम्मेदारियों और दायित्वों का निर्वहन करेंगे तथा समान अधिकार व लाभ की अपेक्षा भी रखेंगे।'' जैसा कि स्पष्ट है, एनएसजी से छूट न तो स्पष्ट है और न ही बिना शर्त। मनमोहन सिंह फिर से अपनी नवीन रुचि का इजहार करते हुए वाणिज्यिक आणविक ऊर्जा को पर्यावरण के अनुकूल टिकाऊ आर्थिक विकास बताते हैं। जबकि 21-22 अगस्त को एनएसजी की बैठक में अमेरिकी मसौदे से सबसे पहले सेक्शन 1(ई) हटाया गया। यह सेक्शन 'टिकाऊ विकास और संपन्नता के लिए ऊर्जा के साफ-सुथरे और भरोसेमंद स्त्रोत की विश्व की आवश्यकता को पहचानता है। अनेक एनएसजी सदस्य मानते हैं कि परमाणु ऊर्जा वैश्विक कार्बन उत्सर्जन और सस्ती ऊर्जा जरूरतों की पूर्ति नहीं करती। ऊर्जा और पर्यावरण सुरक्षा का रास्ता कार्बन रहित अक्षय ऊर्जा का है, जिसके अनवरत स्त्रोत प्रकृति के उपादान हैं। अक्षय ऊर्जा से ही देश की ईधन आपूर्ति के बाहरी स्त्रोतों पर निर्भरता खत्म होगी। दरअसल, परमाणु ऊर्जा का ऐसा हौव्वा खड़ा कर दिया है कि अधिकांश भारतीयों को यह भी मालूम नहीं है कि उनका देश आज परमाणु ऊर्जा से अधिक बिजली पवन ऊर्जा से पैदा कर रहा है।
भारत पर ऐसे समूह की एकतरफा शर्ते लाद दी गई हैं, जिसका वह सदस्य भी नहीं है। इस समूह की स्थापना जुलाई 1974 में भारत को दंडित करने के लिए हुई थी। इससे एक माह पूर्व ही भारत ने परमाणु परीक्षण किया था। आज भारत ने खुद को एनएसजी के सामने याचक के रूप में पेश किया है। इसी एनएसजी को भारत कुछ समय पहले तक संयुक्त राष्ट्र के प्रभावक्षेत्र से बाहर एक गिरोह बताया करता था। अगर भविष्य में यह गिरोह नई शर्तें थोपने के लिए दिशानिर्देश में बदलाव लाता है तो विदेशों पर निर्भर अरबों-खरबों रुपये के रिएक्टर खरीद चुके भारत के सामने उन शर्तो को स्वीकार करने के अलावा कोई चारा नहीं होगा। भारत को निर्णय निर्धारण में कोई अधिकार देने के बजाय एनएसजी को भविष्य में बदलाव के लिए पुनर्विचार का अधिकार सौंप दिया गया है। यह दुखद है कि तथ्य और कथ्य के बीच की रेखा इतनी धुंधली हो गई है कि इस करार पर गंभीर बहस की गुंजाइश काफी कम रह जाती है। संसद का मानसून सत्र भी आयोजित नहीं किया गया, जिससे नौकरशाही को मिथ्या प्रचार करने का खुला मौका मिल गया है। करार में जोड़े गए नए प्रावधान भविष्य में और भी बड़े विवादों और झगड़ों का कारण बनेंगे। भारत गंभीर समस्याओं को न्यौता दे रहा है, किंतु वर्तमान नेतृत्व तात्कालिक निजी हित साधने का ही इच्छुक है। यह नेतृत्व इसलिए परेशान नहीं है, क्योंकि इसके दुष्परिणाम झेलने के लिए वह मौजूद नहीं होगा।
[एनएसजी की छूट को भारतीय हितों के खिलाफ बता रहे हैं ब्रह्मंा चेलानी]
sabhar-http://qa.in.jagran.yahoo.com/news/opinion/general/6_3_4804596.html

Sunday, 23 December 2012

थोरियम युग में छा जाएगा भारत

भविष्य में ऊर्जा संकट की आशंका से पूरी दुनिया जूझ रही है, और डर के इस माहौल में एक बार फिर से थोरियम पॉवर की चर्चा फ़ैशन में आ गई है. इसे भविष्य का परमाणु ईंधन बताया जा रहा है. थोरियम के बारे में वैज्ञानिकों का मानना है कि यूरेनियम की तुलना में यह कहीं ज़्यादा स्वच्छ, सुरक्षित और 'ग्रीन' है. और, इन सब आशावादी बयानों में भारत का भविष्य सबसे बेहतर दिखता है क्योंकि दुनिया के ज्ञात थोरियम भंडार का एक चौथाई भारत में है.

अहम सवाल ये है कि अब तक थोरियम के रिएक्टरों का उपयोग क्यों नहीं शुरू हो पाया है, जबकि इस तत्व की खोज हुए पौने दो सौ साल से ऊपर बीत चुके हैं? इसका सर्वमान्य जवाब ये है- थोरियम रिएक्टर के तेज़ विकास के लिए विकसित देशों की सरकारों और वैज्ञानिक संस्थाओं का सहयोग चाहिए, और इसके लिए वे ज़्यादा इच्छुक नहीं हैं. सबको पता है कि यूरेनियम और प्लूटोनियम की 'सप्लाई लाईन' पर कुछेक देशों का ही नियंत्रण है, जिसके बल पर वो भारत जैसे बड़े देश पर भी मनमाना शर्तें थोपने में सफल हो जाते हैं. इन देशों को लगता है कि थोरियम आधारित आणविक ऊर्जा हक़ीक़त बनी, तो उनके धंधे में मंदी आ जाएगी, उनकी दादागिरी पर रोक लग सकती है...और भारत जैसा देश परमाणु-वर्ण-व्यवस्था के सवर्णों की पाँत में शामिल हो सकता है.

थोरियम आधारित परमाणु रिएक्टर के विकास में खुल कर अनिच्छा दिखाने वालों में यूरोपीय संघ सबसे आगे है. शायद ऐसा इसलिए कि ज्ञात थोरियम भंडार में नार्वे के अलावा यूरोप के किसी अन्य देश का उल्लेखनीय हिस्सा नहीं है. (वैसे तो, रूस में भी थोरियम का बड़ा भंडार नहीं है, लेकिन वहाँ भविष्य के इस ऊर्जा स्रोत पर रिसर्च जारी है. शायद, थोरियम रिएक्टरों के भावी बाज़ार पर रूस की नज़र है!)

यूरोपीय परमाणु अनुसंधान संगठन(CERN) ने थोरियम ऊर्जा संयंत्र के लिए ज़रूरी एडीएस रिएक्टर(accelerator driven system reactor) के विकास की परियोजना शुरू ज़रूर की थी. लेकिन जब 1999 में एडीएस रिएक्टर का प्रोटोटाइप संभव दिखने लगा तो यूरोपीय संघ ने अचानक इस परियोजना की फ़ंडिंग से हाथ खींच लिया.

यूनीवर्सिटी ऑफ़ बैरगेन के इंस्टीट्यूट ऑफ़ फ़िजिक्स एंड टेक्नोलॉजी के प्रोफ़ेसर एगिल लिलेस्टॉल यूरोप और दुनिया को समझाने की अथक कोशिश करते रहे हैं कि थोरियम भविष्य का ऊर्जा स्रोत है. उनका कहना है कि वायुमंडल में कार्बन के उत्सर्जन को कम करने के लिए ऊर्जा खपत घटाना और सौर एवं पवन ऊर्जा का ज़्यादा-से-ज़्यादा दोहन करना ज़रूरी है, लेकिन ये समस्या का आंशिक समाधान ही है. प्रोफ़ेसर लिलेस्टॉल के अनुसार भविष्य की ऊर्जा सुरक्षा सिर्फ़ परमाणु ऊर्जा ही दे सकती है, और बिना ख़तरे या डर के परमाणु ऊर्जा हासिल करने के लिए थोरियम पर भरोसा करना ही होगा.

उनका कहना है कि थोरियम का भंडार यूरेनियम के मुक़ाबले तीन गुना ज़्यादा है. प्रति इकाई उसमें यूरेनियम से 250 गुना ज़्यादा ऊर्जा है. थोरियम रिएक्टर से प्लूटोनियम नहीं निकलता, इसलिए परमाणु बमों के ग़लत हाथों में पड़ने का भी डर नहीं. इसके अलावा थोरियम रिएक्टर से निकलने वाला कचरा बाक़ी प्रकार के रिएक्टरों के परमाणु कचरे के मुक़ाबले कहीं कम रेडियोधर्मी होता है.

प्रोफ़ेसर एगिल लिलेस्टॉल के बारे में सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि यूरोपीय परमाणु अनुसंधान संगठन की थोरियम रिएक्टर परियोजना में वो उपप्रमुख की हैसियत से शामिल थे. उनका कहना है कि मात्र 55 करोड़ यूरो की लागत पर एक दशक के भीतर थोरियम रिएक्टर का प्रोटोटाइप तैयार किया जा सकता है. लेकिन डर थोरियम युग में भारत जैसे देशों के परमाणु ईंधन सप्लायर बन जाने को लेकर है, सो यूरोपीय संघ के देश थोरियम रिएक्टर के विकास में दिलचस्पी नहीं दिखा रहे.

ख़ुशी की बात है कि भारत अपने बल पर ही थोरियम आधारित परमाणु ऊर्जा के लिए अनुसंधान में भिड़ा हुआ है. भारत की योजना मौजूदा यूरेनियम आधारित रिएक्टरों को हटा कर थोरियम आधारित रिएक्टर लगाने की है. कहने की ज़रूरत नहीं कि भारत को इसमें सफलता ज़रूर ही मिलेगी.


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