Thursday, 28 October 2010

करार से आगे की बेकरारी

परमाणु समझौते पर अंतिम मुहर भी लग गई। भारतीय विदेशमंत्री प्रणब मुखर्जी और अमेरिकी विदेश मंत्री कोंडोलीजा राइस ने शुक्रवार को वॉशिंगटन डीसी में समझौते के कागजों पर हस्ताक्षर करने के बाद अमेरिकी विदेश विभाग के बेंजामिन फ्रैंकलिन हाल में जिस गर्मजोशी के साथ हाथ मिलाया उससे साफ पता चल रहा था कि दोनों सरकारों ने इस दिन का न जाने कितने दिनों से इंतजार किया है।

अमेरिकी विदेशमंत्री कोंडोलीजा राइस ने कहा कि समझौते के साथ ही दुनिया के सबसे बड़े और सबसे पुराने लोकतंत्र अपने मूल्यों के आधार पर आज एक मंच पर हैं।


123 समझौते पर हस्ताक्षर के साथ ही भारत पर असैनिक कार्यों के लिए परमाणु ईंधन और तकनीक के व्यापार पर लगा प्रतिबंध भी खत्म हो गया है। वर्ष 1974 में भारत में हुए परमाणु परीक्षण के बाद ही अमेरिका ने भारत के साथ ऐसे किसी समझौते पर प्रतिबंध लगा दिया था। भारतीय विदेशमंत्री प्रणब मुखर्जी ने कहा कि यह एक ऐतिहासिक क्षण है।

अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश और भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह ने 18 जुलाई 2005 में इस समझौते की इच्छा जाहिर की थी और तब से अब तक समझौते पर अंतिम मुहर लगने में 3 साल से ज्यादा लग गए।

इन 3 सालों में दोनों सरकारों ने अपने देशों में और दुनिया से भी विरोध का सामना किया। ऐसे कई अवसर आए जब लगा कि समझौता अंतिम मुकाम तक नहीं पहुँच पाएगा। समझौते के विशेषज्ञ भी कहते हैं कि उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि इतनी जल्दी यह समझौता पूरा हो जाएगा।

बुश सरकार इसे अपने कार्यकाल की बड़ी उपलब्धि मान रही है। यह पूछे जाने पर कि अमेरिकी कंपनियाँ अब परमाणु समझौते के बाद भारत से लगभग 180 अरब रुपए के व्यापार की अपेक्षा रख रही है जो कि कुल व्यापार का लगभग 30 प्रतिशत होता है।

पर भारत अमेरिका से परमाणु कारोबार करता है या नहीं लेकिन सबसे अहम बात यह होगी कि भारत और अमेरिका के बीच सा‍मरिक हितों संबंधी रिश्ते कैसे विकसित होंगे? क्या भारत एशिया में अमेरिका के प्रभाव को बढ़ाने में अमेरिकी हितों का संवर्धन करेगा? क्या सामरिक मामलों पर भारत की नीतियाँ अमेरिकी प्रभाव से मुक्त रह पाएँगी?

भारत-अमेरिकी परमाणु करार के सीनेट में पारित होने के ठीक पहले फ्रांस ने भारत के साथ असैनिक परमाणु करार पर हस्ताक्षर किए थे। इस ऐतिहासिक सहयोग के तहत आपसी सहयोग बढ़ाने की बात कही गई है और फ्रांसीसी रिएक्टर भारत को बेचे जा सकेंगे।

फ्रांसीसी राष्ट्रपति भवन से जारी बयान में कहा गया कि भारत और फ्रांस असैनिक परमाणु सहयोग के तहत द्विपक्षीय समझौते पर दस्तखत का स्वागत करते हैं। इसके तहत ऊर्जा और रिसर्च के क्षेत्र में द्विपक्षीय सहयोग किया जाएगा।

भारत और फ्रांस के बीच भी इस आशय का समझौता हुआ। परमाणु करार भारत की अर्थव्यवस्था और बढ़ती ऊर्जा माँग को पूरा करने के लिए अच्छा साबित हो सकता है लेकिन परमाणु बिजली घरों से उत्पन्न होने वाले परमाणु, रेडियोएक्टिव कचरे का आज की तारीख़ तक न तो भारत के पास कोई हल है न ही किसी और देश के पास।

इसके अलावा क्या बाकी दुनिया के साथ असैनिक परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में भी भारत के अन्य देशों के साथ सहयोग बढ़ेगा? अगर ऐसा होता है तो क्या अमेरिकी सरकारों को इससे परेशानी नहीं होगी?

ऐसे बहुत से सवालों के जवाब भी अभी समय के गर्भ में हैं जिनके सामने आने में समय लगेगा और तभी यह तय हो सकेगा कि भारत के साथ अमेरिकी करार या फ्रांस के साथ समझौता कितना लाभदायक होगा?

भारत अब अरबों डॉलर के परमाणु रिएक्टर अमेरिका, फ्रांस या रूस से खरीद सकता है, लेकिन इन सौदों का असली आयात सामरिक महत्व की तकनीक और हथियार ही होंगे।

इस समझौते के बाद अमेरिका का भारत को अपना करीबी सहयोगी समझना स्वाभाविक ही होगा। ऐसी हालत में क्या भारत सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण अमेरिकी योजना में भागीदार बनेगा? क्या भारत एशिया में शक्ति संतुलन बनाए रखने में निर्णायक भूमिका निभाएगा?

अब इस समझौते के बाद भारत के प्रत्येक कदम को विश्वव्यापी सामरिक परिप्रेक्ष्य में देखा जाएगा, जिससे यह भी तय होगा कि इस समझौते के बाद भारत, चीन जैसे एशियाई देश की तुलना में कहाँ खड़ा होता है? और उसका कितना महत्व बढ़ता है?
sandeep tivari

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