Wednesday, 27 October 2010

परमाणु दायित्‍व विधेयक-2010

परमाणु दायित्‍व विधेयक-2010 पर विचार करने वाली संसदीय समिति ने सिफारिश की है कि परमाणु प्रतिष्‍ठान में किसी हादसे के लिए संबंधित कंपनी को ही जिम्‍मेदार ठहराए जाने की व्‍यवस्‍था होनी चाहिए और इसके लिए हर्जाने की रकम 500 करोड़ रुपये से बढ़ा कर 1500 करोड़ रुपये की जानी चाहिए। विज्ञान व तकनीक मंत्रालय से जुड़ी स्‍थायी संसदीय समिति की
यह रिपोर्ट बुधवार को संसद के दोनों सदनों में रखी गई। समिति ने विधेयक में मुआवजे का दावा किए जाने के लिए मियाद 10 साल से बढ़ा कर 20 साल किए जाने का प्रस्‍ताव शामिल करने की भी सिफारिश की है।



समिति की रिपोर्ट पेश किए जाने के दौरान दोनों सदनों में हंगामा हुआ। लोकसभा में राजद प्रमुख लालू यादव और सपा अध्‍यक्ष मुलायम सिंह यादव ने आरोप लगाया कि सरकार ने भाजपा के साथ समझौता कर लिया है। उनका दावा था कि इसके तहत गुजरात में मुख्‍यमंत्री नरेंद्र मोदी और सोहराबुद्दीन मुठभेड़ कांड में फंसे मोदी के करीबी अमित शाह को सीबीआई जांच में फायदा पहुंचाया जाएगा। बदले में भाजपा संसद में परमाणु जवाबदेही विधेयक का समर्थन करेगी। राज्‍यसभा में रिपोर्ट रखे जाने के दौरान वामपंथी सांसदों ने जोरदार हंगामा किया।



परमाणु दायित्व विधेयक-2010 क्या है?



परमाणु दायित्व विधेयक -2010 ऐसा क़ानून बनाने का रास्ता है जिससे किसी भी असैन्य परमाणु संयंत्र में दुर्घटना होने की स्थिति में संयंत्र के संचालक का उत्तरदायित्व तय किया जा सके. इस क़ानून के ज़रिए दुर्घटना से प्रभावित लोगों को क्षतिपूर्ति या मुआवज़ा मिल सकेगा। सरकार ने 500 करोड़ रुपये का मुआवजा प्रस्‍तावित किया है। विधेयक के विरोधी इसे काफी कम और परमाणु कारोबारियों के हित में बता रहे हैं।



अमरीका और भारत के बीच अक्तूबर 2008 में असैन्य परमाणु समझौता पूरा हुआ। इस समझौते को ऐतिहासिक कहा गया था क्योंकि इससे परमाणु तकनीक के आदान-प्रदान में भारत का तीन दशक से चला आ रहा कूटनीतिक वनवास ख़त्म होना था। इस समझौते के बाद अमरीका और अन्य परमाणु आपूर्तिकर्ता देशों से भारत को तकनीक और परमाणु सामग्री की आपूर्ति तब शुरु हो सकेगी जब वह परमाणु दायित्व विधेयक के ज़रिए एक क़ानून बना लेगा।



कैसे होगी क्षतिपूर्ति?



इस विधेयक के मसौदे में प्रावधान किया गया है कि क्षतिपूर्ति या मुआवज़े के दावों के भुगतान के लिए परमाणु क्षति दावा आयोग का गठन किया जाएगा। विशेष क्षेत्रों के लिए एक या अधिक दावा आयुक्तों की नियुक्ति की जा सकती है। इन दावा आयुक्तों के पास दीवानी अदालतों के अधिकार होंगे।



क्या है विवाद?



इस विधेयक पर विपक्षी दलों ने कई आपत्तियाँ दर्ज की थीं जिसके बाद इसे सरकार ने टाल दिया था और इसे संसद की स्थायी समिति को भेज दिया गया था। समिति की सिफ़ारिशें आ जाने के बाद अब विपक्षी दलों से चर्चा के आधार पर सरकार विधेयक में आवश्यक प्रावधान करेगी। कहा जा रहा है कि सरकार ने मुख्‍य विपक्षी पार्टी भाजपा को इस बारे में राजी कर लिया है।



एक विवाद मुआवज़े की राशि को लेकर था। पहले संचालक को अधिकतम 500 करोड़ रुपयों का मुआवज़ा देने का प्रावधान था, लेकिन भारतीय जनता पार्टी की आपत्ति के बाद सरकार ने इसे तीन गुना करके 1500 करोड़ रुपए करने को मंज़ूरी दे दी है। कहा गया है कि सरकार ने कहा है कि वह समय-समय पर इस राशि की समीक्षा करेगी और इस तरह से मुआवज़े की कोई अधिकतम सीमा स्थायी रूप से तय नहीं होगी।



दूसरा विवाद मुआवज़े के लिए दावा करने की समय सीमा को लेकर था. अब सरकार ने दावा करने की समय सीमा को 10 वर्षों से बढ़ाकर 20 वर्ष करने का निर्णय लिया है।



तीसरा विवाद असैन्य परमाणु क्षेत्र में निजी कंपनियों को प्रवेश देने को लेकर था। कहा जा रहा है कि सरकार ने अब यह मान लिया है कि फ़िलहाल असैन्य परमाणु क्षेत्र को निजी कंपनियों के लिए नहीं खोला जाएगा और सरकारी या सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम ही इस क्षेत्र में कार्य करेंगे।



विवाद का चौथा विषय परमाणु आपूर्तिकर्ताओं को परिवहन के दौरान या इसके बाद होने वाली दुर्घटनाओं को लिए जवाबदेह ठहराने को लेकर है। विधेयक का जो प्रारूप है वह आपूर्तिकर्ताओं को जवाबदेह नहीं ठहराता।



आख़िरी विवाद का विषय अंतरराष्ट्रीय संधि, कन्वेंशन फॉर सप्लीमेंटरी कंपनसेशन (सीएससी) पर हस्ताक्षर करने को लेकर है। यूपीए सरकार ने अमरीका को पहले ही यह आश्वासन दे दिया है कि वह इस संधि पर हस्ताक्षर करेगा लेकिन वामपंथी दल इसका विरोध कर रहे हैं।



क्या है सीएमसी पर हस्ताक्षर करने का मतलब



सीएमसी एक अंतरराष्ट्रीय संधि है जिस पर हस्ताक्षर करने का मतलब यह होगा कि किसी भी दुर्घटना की स्थिति में दावाकर्ता सिर्फ़ अपने देश में मुआवज़े का मुक़दमा कर सकेगा। यानी किसी दुर्घटना की स्थिति में दावाकर्ता को किसी अन्य देश की अदालत में जाने का अधिकार नहीं होगा।



वैसे यह संधि थोड़ी विवादास्पद है, क्योंकि इसमें जो प्रावधान हैं, उसकी कोई कानूनी अनिवार्यता नहीं है। सीएसई पर वर्ष 1997 में हस्ताक्षर हुए हैं लेकिन दस साल से भी अधिक समय बीत जाने के बाद इस पर अब तक अमल नहीं हो पाया है।



क्या-क्या हैं प्रावधान?



राजनीतिक दलों से हुई चर्चा और संसद की स्थाई समिति की सिफ़ारिशों के आधार पर सरकार अब मौजूदा विधेयक में संशोधन करेगी। इसके बाद संशोधित विधेयक को केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंज़ूरी दी जाएगी फिर इसे संसद में मंज़ूरी के लिए पेश किया जाएगा।



इसलिए यह कहना फ़िलहाल कठिन होगा कि वास्तव में विधेयक में सरकार क्या-क्या प्रावधान करती है लेकिन माना जा रहा है कि सरकार ने जिन बिंदुओं पर समझौते की हामी भरी है वह सब नए प्रारूप में शामिल होंगे।



कब तक होगा?



असैन्य परमाणु समझौते के तहत परमाणु तकनीक और सामग्री मिलना तभी शुरू हो सकेगा जब परमाणु दायित्‍व विधेयक पारित होकर क़ानून बन जाएगा। इसलिए सरकार इसे जल्‍दी ही पारित कराना चाहेगी, लेकिन विपक्षी दबाव के चलते ऐसा नहीं हो पा रहा है। अब भाजपा के सकारात्‍मक रुख को देखते हुए उम्‍मीद है कि सरकार की मंशा पूरी होगी। सरकार नवंबर से पहले इसे क़ानून का रूप देना चाहती ताकि जब अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा भारत के दौरे पर आएं तो भारत पूरी तरह से तैयार रहे।



परमाणु जवाबदेही बिल के मसौदे में 18 संशोधन करने के बावजूद इसकी राह में नई बाधाएं खड़ी हो गई हैं। भाजपा ने आरोप लगाया है कि सरकार ने उस मसौदे में थोड़ा बदलाव किया है जिस पर उसके और सरकार के बीच सहमति बनी थी।

परमाणु जवाबदेही बिल को लेकर केंद्र सरकार एक बार फिर मुश्किल में आ गई है. मुख्य विपक्षी दल बीजेपी और वामपंथी पार्टियों ने बिल में किए गए सरकार के संशोधनों को नकार दिया है. बीजेपी ने इसका समर्थन करने से इनकार कर दिया है.




बिल के विरोधियों का कहना है कि इसके मौजूदा प्रावधानों के हिसाब से हादसा हो जाने पर पीड़ितों को मुआवजा दिला पाना मुश्किल होगा. भारत में अमेरिका की कई बड़ी कंपनियों को परमाणु बिजली क्षेत्र में प्रवेश की इजाजत देने के लिए इस बिल का पास होना जरूरी है. पहले भारतीय जनता पार्टी कुछ संशोधनों की मांग कर रही थी और सरकार ने पिछले हफ्ते बिल में वे बदलाव कर दिए थे. इसके बाद बीजेपी ने बिल का समर्थन करने की बात कही थी, लेकिन अब उसका कहना है कि बिल में किए गए बदलाव संतोषजनक नहीं है.



बीजेपी का कहना है कि बिल के मुताबिक सप्लायर्स को तभी मुआवजा देना होगा जब दुर्घटना में उनकी मंशा साबित होगी. राज्यसभा में पार्टी के उपनेता एसएस आहलुवालिया ने कहा, "उन्होंने मंशा शब्द को जोड़ दिया है. यह तो समस्या है. आप कैसे साबित करेंगे कि दुर्घटना मंशा की वजह से हुई. यह प्रावधान सही नहीं है."



इस मुद्दे पर वाम दलों की राय के बारे में बताते हुए सीपीआई के राष्ट्रीय सचिव डी राजा ने कहा, "मुझे नहीं लगता कि सरकार ने जो बदलाव किए हैं, उनसे हम सहमत हो सकते हैं. यह जायज और सही तर्क नहीं है. आपदा तो आपदा है. कौन मानेगा कि ऐसा काम जानबूझकर किया जा सकता है. मैं तो कहता हूं कि यह एकदम वाहियात तर्क है. कोई सप्लायर इसमें अपनी मंशा स्वीकार नहीं करेगा."



सरकार को बिल पास कराने के लिए बीजेपी के समर्थन की जरूरत है क्योंकि सरकार के पास सैद्धांतिक रूप से भले ही बहुमत हो, लेकिन बीजेपी इसे राज्यसभा में रोकने की ताकत रखती है.



प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह खुद इस बिल को पास कराने में दिलचस्पी दिखा रहे हैं. इस तरह की खबरें आई हैं कि प्रधानमंत्री कार्यालय के एक राज्य मंत्री ने विपक्षी नेताओं से बातचीत की है. उधर कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी का कहना है कि सरकार विचार विमर्श के लिए तैयार है. उन्होंने कहा, "चूंकि आम राय नहीं बन रही है, इसलिए सरकार विचार विमर्श के लिए तैयार है और हम फिर से उन्हें भरोसा दिलाने की कोशिश करेंगे."

कैबिनेट ने परमाणु जवाबदेही विधेयक में संशोधनों को मंजूरी दे दी है जिसका मकसद परमाणु बिजली के 150 अरब डॉलर के भारतीय बाजार को दुनिया की कंपनियों के लिए खोलना है. शनिवार को यह बिल संसद में पेश हो सकता है.




बुधवार को एक संसदीय पैनल ने विधेयक में कुछ बदलावों की सिफारिश की. इनमें हादसे की स्थिति में मुआवजे को तीन गुना करना और निजी कंपनियों की जवाबदेही बढ़ाना शामिल है. नाम जाहिर न करने की शर्त पर एक कैबिनेट मंत्री ने कहा, "पैनल ने जिन बदलावों की सिफारिश की, उन्हें मंत्रिमंडल ने मंजूर कर लिया है."



विपक्षी बीजेपी ने पैनल के संशोधनों का स्वागत किया है. बीजेपी को खासकर इस बात पर एतराज है कि किसी दुर्घटना की स्थिति में आपूर्तिकर्ता को सिर्फ तभी जवाबदेह माना जाएगा जब ऑपेरटर और सप्लायर के बीच कोई पहले से ही ऐसा कोई समझौता हो. केंद्रीय पृथ्वी विज्ञान मंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने बताया, "हम इसमें मामूली बदलाव करेंगे."



अगर इस विधेयक को संसद में मंजूरी मिल जाती है तो अमेरिका की जनरल इलैक्ट्रिक और जापान की तोशिबा कोर्प की सहायक कंपनी वेस्टिंगहाउस इलैक्ट्रिक के लिए भारतीय परमाणु बिजली बाजार में उतरने का रास्ता साफ होगा. यह कंपनियां दुर्घटना की स्थिति में दिए जाने वाले मुआवजे पर स्थिति साफ हुए बिना भारतीय बाजार में दाखिल नहीं होना चाहती हैं.



भारत का परमाणु बिजली क्षेत्र अत्यधिक नियंत्रित है और सिर्फ एक सरकारी क्षेत्र की कंपनी इसे चलाती है. संसदीय पैनल ने सिफारिश की है कि हादसे की स्थिति में मुआवजे की सीमा को 32 करोड़ डॉलर तय किया जाए. साथ ही अगर किसी प्राइवेट कंपनी की लापरवाही से हादसा होता है तो उससे मुआवजा मांगने का विकल्प रखा गया है. सरकार की तरफ से दिए जाने वाले मुआवजे का बोझ केंद्र सरकार को उठाना पड़ेगा जो लगभग 30 करोड़ डॉलर के आसपास हो सकता है.



सरकार ने शुरुआती बिल पर विपक्ष के विरोध के बाद इसकी समीक्षा के लिए एक संसदीय पैनल बनाया. शुरुआत में परमाणु बिजली प्लांट चलाने वाली कंपनी की तरफ से दिए जाने वाले मुआवजे को सिर्फ 11 करोड़ डॉलर रखा गया था जो अमेरिका के मुकाबले 23 गुना कम है.

संसद की एक समिति ने परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में भारत के दरवाजे विश्व बाजार के लिए खोलने से पहले इससे जुड़े प्रस्तावित कानून में बदलाव की सिफारिश की है. समिति ने संसद में अपनी रिपोर्ट पेश कर सरकार को यह सुझाव दिया है.




बुधवार को पेश रिपोर्ट में समिति ने सरकार से सिफारिश की है कि कोई हादसा होने की स्थिति में क्षतिपूर्ति के पुख्ता इंतज़ाम करने और निजी कंपनियों की ज़िम्मेदारी का दायरा बढ़ाने वाले प्रावधान परमाणु जवाबदेही विधेयक में शामिल किए जाएं. मौजूदा विधेयक पर विपक्ष के भारी विरोध को देखते हुए सरकार ने इस समिति का गठन किया था. संसद के दोनों सदनों में पेश की गई रिपोर्ट में 150 अरब अमेरिकी डॉलर के निवेश की क्षमता वाले भारतीय परमाणु बाजार में निजी कंपनियों पर हर्जाने की ज़िम्मेदारी 32 करोड़ अमेरिकी डॉलर तक रखने का सुझाव दिया गया है.



मौजूदा विधेयक में निजी कंपनियां और ठेकेदार इस ज़िम्मेदारी से मुक्त हैं. सिर्फ सरकारी संचालकों पर हर्जाने की 11 करोड़ अमेरिकी डॉलर तक की सीमा नियत है. इन सिफारिशों को स्वीकार किए जाने पर भारतीय बाजार के खुलने की आस लगाए बैठी अमेरिका की जीई और जापान की तोशीबा जैसी नामी कंपनियों के लिए यह मंहगा सौदा साबित हो सकता है. ऐसे में निजी कंपनियों को बीमा के प्रीमियम की ज्य़ादा राशि देनी होगी.



रिपोर्ट के मुताबिक जवाबदेही कानून को भारत की ज़रूरतों के अनुकूल बनाना इसका मूल मकसद है जिसमें किसी अनहोनी के समय क्षतिपूर्ति के पर्याप्त उपाय हों. साथ ही भारतीय परमाणु ऊर्जा उद्योग बिना किसी अतिरिक्त बोझ के आगे बढ़ सके. प्रस्तावित विधेयक में फिलहाल कोई निजी कंपनी खुद को दिवालिया घोषित कर हर्जाने की ज़िम्मेदारी से बच सकती है.



कमेटी के अध्यक्ष टी. सुब्बीरामी रेड्डी ने रिपोर्ट को राज्यसभा में और सांसद प्रदीप टमटा ने लोकसभा में पेश किया. सरकार इस विधेयक को जल्द से जल्द संसद से पारित करा लेना चाहती है जिससे अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की आगामी नवंबर में प्रस्तावित भारत यात्रा से पहले अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के लिए भारतीय बाज़ार के दरवाजे सुगमता से खोले जा सकें.

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