Thursday, 28 October 2010

करार की कैद


अमरीका का आणविक ऊर्जा एक्ट 1994 भी एन.पी.टी. को ही वैश्विक परमाणु संधि का मूल आधार मानना है। इस अधिनियम की धारा 123 के तहत जिन छूटों का जिक्र आज हो रहा है, वे सर्वव्यापी नहीं हैं।डा. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रगश् सरकार परमाणु मुद्दे पर हासिल विश्वासमत को ‘सेन्स ऑफ हाउस’ यानि कि लोक सभा की धारणा बताने से नहीं चूक रही है। लेकिन एक सवाल पर सरकार निरुत्तर है। वह यह कि जब परमाणु मुद्दे से जुड़े सभी पहलू संसद के पटल पर रखे ही नहीं गए, तब लोक सभा किस आधार पर कोई धारणा बना सकती है?
शायद सरकार की मंशा यही थी कि परमाणु मुद्दे से जुड़ी संपूर्ण जानकारी का खुलासा किए बिना, परमाणु समझौते के पक्ष में एक कथित धारणा का निर्माण किया जाये। तथ्यों से पूर्णत: अनभिज्ञ ऐसी कथित संसदीय धारणा के आधार पर, मनमोहन सरकार राष्ट्र को आर्थिक गुलामी की ओर जबरन ले जा रही है।
परमाणु करार से जुड़ी बहस में अभी तक इसका उल्लेख नहीं हुआ कि-
1- वैकल्पिक स्वदेशी परमाणु संभावनाएं क्या हैं?
2-अमरीका के साथ परमाणु समझौता करने से हमें क्या अतिरिक्त लाभ मिल रहा है?
3- इस कथित अतिरिक्त लाभ के ऐवज में हम अपने ऊपर क्या-क्या बंदिश स्वीकार कर रहे हैं? अभी तक इनका पूर्ण एवं     सही  आकलन नही हुआ है।
4- परमाणु करार का हमारी अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा इस लाभ हानि का जायजा लिया जाये।
5-निकट भविष्य में परमाणु क्षेत्र की अर्थव्यवस्था में क्या भूमिका रहेगी?
6-भारत-अमरीका परमाणु करार किन-किन क्षेत्रों में और किस हद तक हमारी सम्प्रभुता को खण्डित अथवा सीमित करता है?
डा. पी. के. आइएंगर भूतपूर्व चैयरमैन आणविक ऊर्जा आयोग, डा. गोपालकृष्णन भूतपूर्व चैयरमैन आणविक ऊर्जा विनिमयन मण्डल एवं डा. ए.एन. प्रसाद भूतपूर्व निदेशक भाभा आणविक शोध केन्द्र की ओर से सांसदोँ के नाम एक संयुक्त अपील में कहा गया है कि परमाणु करार के कई गम्भीर परिणाम हो सकते हैं। इन वैज्ञानिकों का मानना है कि समझौते से भारतीय परमाणु व्यवस्था तो कमजोर पड़ेगी ही, साथ ही परमाणु क्षेत्र में स्वदेशी शोध एवं विकास की प्रर्किया को बढ़ाना एवं बचाना भी असंभव हो जाएगा।
सरकारी प्रवक्ता बार-बार कहते हैं कि परमाणु करार से भारत के परमाणु कार्यर्कम के लिए ईंधन की समस्या हमेशा के लिए समाप्त हो जाएगी। परन्तु यह पूर्ण सत्य नहीं है। ऐसा तभी होगा यदि हम इससे जुड़ी सारी शर्तों मान लें। हाईड एक्ट की धारा 102/6 बी के तहत एक शर्त यह भी है कि हमारी विदेश नीति अमरीकी विदेश नीति के अनुकूल रहेगी। गोपालकृष्णन एवं प्रसाद का संयुक्त पत्र यह कहता है- ”आई.ए.ई.ए. के सुरक्षा उपायों के विषय में शक यह है कि यह करार किस सीमा तक भारत-केन्द्रित है। खासकर हाईड एक्ट एवं 123 करार पढ़ने से स्पष्ट हो जाता है कि इन दस्तावेजों में निरंतर बाधारहित ईंधन आपूर्ति के विषय में कोई फख्ता आश्वासन नहीं है, खासकर उन रिएक्टरों के लिए जो भारत आई.ए.ई.ए. सुरक्षा नियमों के तहत स्वयं ला रहा है। अंतरराष्ट्रीय आणविक ऊर्जा प्राधिकरण के विषय में यह जगजाहिर है कि उसे निरंतर ईंधन आपूर्ति के मसले से कोई लेना-देना नहीं है, अत: भारतीय वार्ताकारों को इस विषय पर प्रामाणिक तौर पर कोई आश्वासन नहीं मिला है।”
अंतरराष्ट्रीय आणविक ऊर्जा प्राधिकरण, अमरीका एवं परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह के देशों के साथ किए गए करार एन.पी.टी. पर आधारित हैं। यह जगजाहिर है कि एन.पी.टी. दोहरे मापदण्डों पर आधारित है। परमाणु प्रसार रोकने की मंशा को साक्षी रखकर एन.पी.टी. पद्धति विश्व को दो असमान अधिकारों वाले खेमों में बांटती है। संयुक्त राष्ट्र अमरीका, ब्रिटेन, रूसी महासंघ, फ्रांस एवं चीन को परमाणु अस्त्र वाले देशों का दर्जा दिया गया है। शेष सभी राष्ट्रों को गैर परमाणु अस्त्र वाले देशों का दर्जा दिया गया है। चूंकि इस संधि पर हस्ताक्षर की प्रक्रिया 1 जुलाई 1968 को शुरू की गई थी, अत: केवल उन्हीं देशों को परमाणु अस्त्र सम्पन्न देश माना गया, जो 1967 तक परमाणु परीक्षण के द्वारा परमाणु अस्त्र बना चुके थे। भारत ने प्रथम पोखरण परीक्षण 1974 में किया था, अत: एन.पी.टी. के तहत उसे परमाणु अस्त्र वाला देश स्वीकार नहीं किया गया। यही हालत इजराईल एवं पाकिस्तान की है। अत: इन तीन देशों ने आज तक एन.पी.टी. पर हस्ताक्षर नहीं किया है। इसी कारण इन तीनों देशों को परमाणु अस्त्रों के क्षेत्र में अंतरराष्ट्रीय सहयोग वर्जित है। इस बात को भारत सरकार भलीभांति जानती है।
एन.पी.टी. के प्रावधानों को ही ध्यान में रखते हुए भारत के परमाणु उपकरणों का विभाजन सामरिक एवं सामान्य दो खण्डों में हो रहा है। वर्तमान करार सामान्य परमाणु संसाधनों से संबंधित है। लेकिन इसके लागू होते ही समझौते से पूर्व निर्मित पूर्णत: देशी सामान्य संसाधनों के ईंधन का कोई अंश पूर्णत: देशी सामरिक संसाधन में उपयोग नहीं हो पायेगा।
एन.पी.टी. संधि की धारा 3 के तहत भारत अंतरराष्ट्रीय आणविक ऊर्जा प्राधिकरण के समक्ष अपने सामान्य परमाणु संसाधनों को निगरानी एवं सुरक्षा उपाय हेतु पेश कर रहा है। भारत सरकार इस बात को नजरअन्दाज करके भले ही यह कह रही है कि वह आई.ए.ई.ए. से सीधे सम्पर्क में है और वह एन.पी.टी. पर दस्तखत नहीं करेगी, लेकिन सत्य यह है कि आई.ए.ई.ए. के सुरक्षा उपाय करार एवं जांचकर्ता करार दोनों ही मूलत: एन.पी.टी. पर आधारित हैं।
इसी प्रकार अमरीका का आणविक ऊर्जा एक्ट 1994 भी एन.पी.टी. को ही वैश्विक परमाणु संधि का मूल आधार मानना है। इस अधिनियम की धारा 123 के तहत जिन छूटों का जिक्र आजकल हो रहा है, वे सर्वव्यापी नहीं हैं। धारा 123 के तहत कुछ प्रावधानों से ही छूट मिलती है, खासकर सरकार बनाम सरकार रिश्तों में, परन्तु एन.पी.टी. तो अमरीकी अधिनियम के हर प्रावधान से जुड़ा हुआ है।
इसी प्रकार एन.पी.टी. का पक्षपाती ढांचा ही जैंगर कमिटी/ न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप के संचालन का आधार है। और यह तीनों- जैंगर कमिटी- परमाणु आपूर्ति संगठन, एवं अंतरराष्ट्रीय आणविक ऊर्जा प्राधिकरण मिलकर यूरेनियम के पक्ष में व्यवस्था निर्माण करते हैं। यह व्यवस्था भारत विरोधी हैं क्योंकि भारत को यूरेनियम आयात करना पड़ सकता है, जबकि हमारे पास थोरियम के अथाह भण्डार उपलब्ध हैं।
अमरीकी आणविक ऊर्जा अधिनियम, 1928 की धारा 132 के तहत अमरीकी राष्ट्रपति को कभी भी परमाणु सहयोग समाप्त करने का अधिकार है यदि करार साथी देश ने एन.पी.टी. प्रबंधन के तहत कन्वेंशन आन फिजिकल सेक्यूरिटी आफ न्यूक्लीयर मैटीरियल पर दस्तखत नहीं किए हैं। कुछ ऐसी ही चीज अमरीकी रक्षा प्रबंधन से जुड़े प्रतिबंध हैं जो धारा 133 एवं 134 में उल्लिखित हैं। ये प्रतिबंध धारा 123 के द्वारा दी गई छूट के दायरे में नहीं आते और कभी भी इनका इस्तेमाल भारत के विरुध्द किया जा सकता है।
अमरीका-भारत शांतिपूर्ण आणविक ऊर्जा सहयोग अधिनियम, 2006 जिसे आमतौर पर हाईड एक्ट कहा जाता है, उसके कुछ प्रावधान चौंकाने वाले हैं। धारा 102 (13श् का स्पष्ट कहना है कि यदि अमरीकी कानून के तहत अमरीका से भारत को परमाणु निर्यात किसी भी कारण से प्रतिबंधित हो जाए, तब किसी भी हालत में अमरीका को किसी अन्य देश से उसकी भरपाई नहीं करानी चाहिए। धारा 103 (6श् का भी आगे बढ़कर कहना है कि यदि किसी भी अमरीकी कानून के तहत परमाणु ऊर्जा का उत्पादन थमता है, तब अमरीका को परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह के सदस्य देशों को प्रेरित करना चाहिए कि वे भी भारत को ईंधन देना बंद कर दें। चूंकि भारत को गैर आणविक हथियारों वाला देश घोषित किया गया है, अत: धारा 103 (एशश् के तहत भारत द्वारा परमाणु हथियार बनाने की हर कोशिश को किल करना अमरीकी सरकार की प्रतिबध्दता है।
ऐसा अंदाज लगाया जा रहा है कि 2008 तक तय किए जाने वाले क्लाईमेट चेंज प्रोटोकाल के तहत स्वच्छ ऊर्जा के नाम पर परमाणु ऊर्जा को बढ़ावा दिया जाएगा और जीवाश्ममय ईंधन के उपयोग पर दंड का प्रावधान होगा। इस कारण ताप बिजली घरों के बदले परमाणु बिजली घरों की मांग बढ़ जाएगी। इस मांग को पूरा करने के लिए अमरीका और उसके साथी सक्रिय हो गए हैं। आने वाले समय में यदि सभी नए परमाणु बिजली घरों में अमरीका अथवा पाश्चात्य देशों की दखलंदाजी रहेगी, तो निश्चय ही ऊर्जा के मार्फत उसकी/उनकी दखलंदाजी संपूर्ण अर्थव्यवस्था पर हावी हो जाएगी। कुल मिलाकर भारत-अमेरिका परमाणु समझौते का मूल यही है।
-नमित वर्मा
http://www.bhartiyapaksha.com/

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