Thursday, 28 October 2010

व्यापार गोष्ठी: परमाणु करार देश के साथ छल या उपलब्धि?

बीएस टीम /  September 15, 2008
भारत का स्टेटस बिल्कुल बदल जाएगा
सतेंद्र नाथ 'मतवाला'
कालीकुंज बैरिहवां, गांधी नगर, बस्ती, उत्तर प्रदेश
परमाणु करार भारत की ऐतिहासिक उपलब्धि है। इससे भारत का स्टेटस बिल्कुल बदल गया है। एनएसजी से अनुमति मिलने के बाद परमाणु ईंधन व तकनीक के मामले में अग्रणी देशों से हमें अलग से समझौते करने होंगे। वैश्विक धरातल पर भारत की स्थिति अब और विशिष्ट हो गई है।

दो-दो बार परमाणु परीक्षण करने के बाद भी भारत परमाणु अप्रसार संधि के दायरे में नहीं आता है। इस तरह भारत को अपने ढंग से काम करने की आजादी मिली हुई है। इस तरह से सब कुछ भारत के पक्ष में हैं, इस मामले में एनएसजी कोई बाधा नहीं बन सकता।


बेहद फायदेमंद साबित होगा
राजेंद्र प्रसाद मधुबनी
व्याख्याता मनोविज्ञान, फ्रेण्ड्स कॉलोनी, मधुबनी, बिहार
परमाणु करार कितना महत्वपूर्ण है या नहीं यह भारत द्वारा परमाणु परीक्षण के बाद लगे प्रतिबंध से पता चला था। भारत अस्त-व्यस्त हो गया था। लेकिन हम भारतीयों ने एक जुटता दिखाकर संकट का सामना करते हुए पूरे विश्व के देशों को अपनी लगन और इच्छाशक्ति से जीतते हुए दिखाया था। परमाणु करार द्वारा हमें संसाधन की सुविधा मिलेगी फिर हम दिखाएंगे कि राई को पर्वत को राई अपनी आवश्यकतानुसार बना सकते हैं।

अब देश को पर्याप्त ऊर्जा मिलेगी
राजेश कपूर
एलएचओ, भारतीय स्टेट बैंक, 21181, इंदिरा नगर, लखनऊ
भारत के अधिकांश क्षेत्रों में एक दिन में 12 घंटे भी बिजली नहीं आती है। अब परमाणु करार के रूप में मिली उपलब्धि से पर्याप्त ऊर्जा उपलब्ध होगी। ऐसा अनुमान है कि परमाणु ऊर्जा उद्योग में आने वाले दिनों में 1 लाख 20 हजार करोड़ रुपये का निवेश होगा, जिससे लाखों रोजगार के अवसर उत्पन्न होंगे, उद्योग जगत में क्रांति आएगी, गांवों तक में अवरोध रहित बिजली की आपूर्ति होगी, ये सब देश के हित में होगा।

यह है ऐतिहासिक जीत
हर्ष वर्ध्दन कुमार
बी-62, विजय नगर, दिल्ली
निस्संदेह परमाणु करार एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। कारण कि इस डील से न केवल प्रदूषणरहित व सस्ती बिजली प्राप्त होगी जो हमारी ऊर्जा जरूरतों को पूरी करेगी अपितु 70 के दशक से हम पर जो आर्थिक व तकनीकी बंदिशें लगी हुई हैं, खासकर दोहरे तकनीक की उपयोग पर, वह भी समाप्त होंगी।

गत दिनों 45 सदस्यीय एनएसजी द्वारा करार को ग्रीन सिग्नल मिलने से हमारा परमाणु अकेलापन व परमाणु अस्पृश्यता का कलंक भी मिट गया है। यह हमारी परमाणु कूटनीति की ऐतिहासिक जीत है।

विपक्षी दल भी स्वीकार करें
कृष्ण कुमार उपाध्याय
एडवोकेट, 8262 बैरिहवां, गांधी नगर बस्ती, उत्तर प्रदेश
परमाणु करार को मंजूरी मिलना एक बड़ी जीत है। वैश्विक कूटनीति के साथ ही साथ ऊर्जा के मुद्दे पर भी भारत ने ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है। पहले इस बात की आशंका थी कि एनएसजी के देश अपनी कुछ शर्ते मानने को बाध्य कर सकते हैं लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं।

बातचीत दो दौर में होने और प्रारंभ में कई देशों के विरोध करने के बावजूद नतीजा भारत के पक्ष में आया। करार के संबंध में पैदा हुए गतिरोध से अब मुक्ति मिल गई है। इससे भारत सुनहरे भविष्य की ओर बिना किसी बाधा के अग्रसर हो सकेगा।

भारत शक्तिशाली राष्ट्रों की कतार में
श्याम प्रकाश शर्मा
एडवोकेट, शर्मा कॉलोनी, गांधी नगर, बस्ती, उत्तर प्रदेश
भारत में सत्तापक्ष की हर बात का जोरदार विरोध विपक्ष की आदत बन गई है। इसे इस बात की तनिक भी चिन्ता नहीं होती है कि वह राष्ट्रहित के बारे में सोंचे।

ऐसी ही मानसिकता का परिणाम है कि विपक्ष में हो हल्ला करके ऐसा वातारण बनाने की कोशिश की जिससे लोग इसे देश के लिए हानिकारक समझ बैठे और जनता भी इसके विरोध में आ जाए जबकि आज जब हम परमाणु करार के सभी पहलुओं को देखते हैं तो यह बात साबित हो रही है कि यह भारत की ऐतिहासिक उपलब्धि है। इससे भारत उन शक्तिशाली राष्ट्रों की कतार में स्थान पा गया है जो दुनियां के दादा कहे जाते हैं। इस लिहाज से इस करार को ऐतिहासिक उपलब्धि का ही दर्जा दिया जाना चाहिए। 

ब्रीडर रिएक्टरों से फायदा मिलेगा
अमित कुमार सिंह
जयपुरवा, गांधी नगर, बस्ती, उत्तर प्रदेश
परमाणु करार से परमाणु ऊर्जा उत्पादन के क्षेत्र में काफी मदद मिलने वाली है। समझौते के बाद अपेक्षाकृत तेज ब्रीडर रिएक्टरों के जुड़ने से हमारी परमाणु ऊर्जा क्षमता 2050 तक करीब दो लाख मेगवाट की हो जाएगी जबकि अभी हम केवल चार हजार मेगावाट परमाणु ऊर्जा का उत्पादन कर पा रहे हैं। इस समझौते के संदर्भ में जो आपत्ति है, उसे दरकिनार किया जाना चाहिए। दूसरे विकल्पों को तलाशने पर कोई रोक नहीं है। आवश्यकता होने पर ईंधन आपूर्ति एक देश से रोकी व दूसरे देश से प्राप्त की जा सकती है।

ठगी का खेल लग रहा है
जवेद खानम
गोरेगांव,मुंबई।
हमारी सरकार कहती है कि इस समझौते के बाद पहली बार उसे परमाणु महाशक्ति मान लिया गया है। सारे प्रतिबंध हट जाएंगे,परमाणु उपकरण, तकनीक और ईंधन मिलने के साथ परमाणु ऊर्जा का विकास हो सकेगा। लेकिन खबरों में रोज आने वाले बदलावों को पढ़ कर लगता है कि अमेरिका शेर को बकरी बनाना चाहता है और हम बकरी की खाल ओढ़कर शेर की तरह शिकार खेलना चाहते है। भारत और अमेरिका के बीच चल रहे इस ठगी के खेल से तो बेहतर होता कि फ्रांस और रूस के साथ भारत ऐसे समझौते कर ले।

भारत के लिए लाभकारी है करार
सुजीत कुमार
पाकुड़, झारखंड
असैन्य परमाणु समझौता भारत के विकास में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। ऊर्जा वर्तमान समय में हमारी अदद जरूरत है, ऊर्जा के अभाव में विकास कार्यों की भी परिणति नहीं हो सकती। इसके अभाव में उद्योगों का परिचालन, निमार्ण कार्य व शोध कार्य सभी ठप्प पड़ जाएंगे। देश में आधारभूत संरचना के विकास में ऊर्जा की भूमिका अहम है।

सपनों को साकार करना होगा आसां
कु. शक्ति उपाध्याय
8262, बैरिहवां, गांधी नगर, बस्ती, उत्तर प्रदेश
परमाणु करार विश्वमंच पर भारत की विश्वसनीयता की मान्यता है। बहरहाल, अब भारत अपनी योजना के अनुसार नाभिकीय बिजली उत्पादन योजनाओं के लिए रिएक्टर एवं ईंधन पा सकेगा। जो कोई भी संस्थान ईंधन के अभाव में क्षमता के अनुसार उत्पादन नहीं कर पा रहे हैं, उनको इस पहल से पुनर्जीवन मिलेगा।

हालांकि एनएसजी की स्वीकृति मात्र से भारत की ऊर्जा समस्याओं का समाधान नहीं हो पाएगा लेकिन अब नाभिकीय ऊर्जा योजना को साकार रूप देने में कोई अड़चन नहीं होगी। इस ऐतिहासिक उपलब्धि पर हर भारतवासी को गर्व है, इससे हम सुनहरे कल के सपनों को पूरी तरह से साकार करने का अवसर पा गए हैं। इसके लिए वे सभी राजनीतिक दल धन्यवाद के अधिकारी हैं, जिन्होंने इसमें मदद की है।

उपलब्धि पर शोर मचता है
मूलचंद खत्री
जयपुर
परमाणु करार देश के लिए छल नहीं बल्कि ऐतिहासिक उपलब्धि है। विज्ञान की कोई भी नई उपलब्धि के समय विरोध हमेशा से होता आया है। जिनको इसका श्रेय नहीं मिलता वे ही शोर मचाते हैं। दूसरे को आगे या ऊपर देखना सहन नहीं होता है। मानव मन की कमजोरी है अपने को नीचे या पीछे पाकर असंतुष्ट हो जाता है, आजकल इसकी राजनीतिक शोर मात्र है।

एक सुखद सवेरा है करार
सुमित पाण्डेय
सरधुवा, चित्रकूट, उत्तर प्रदेश
एनएसजी के 45 सदस्य देशों का भारत-अमेरिका परमाणु करार पर हस्ताक्षर करना भारत के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि है। पिछले तीन दशकों से भारत परमाणु संपन्न देशों के प्रतिबंध झेल रहा था। इससे भी इस परमाणु करार ने भारत को निजात दिलाई है।

इन प्रतिबंधों के कारण भारत पहले ही विकसित देशों से तमाम दोहरी इस्तेमाल वाली तकनीक हासिल नहीं कर पाया था, जैसे सुपर कंप्यूटर, लेजर टेक्नोलॉजी और मटेरियल साइंस से जुड़ी तकनीक जो भारत को एक बड़ी आर्थिक शक्ति बना सकती थी। आज अब भारत की अधिकतम आबादी बिना बिजली के अंधेर में रहने को मजबूर है तब इस करार को भारत की जनता के लिए एक सुखद सवेरा कह सकते हैं।

यह करार ऐतिहासिक होगा
सुभाष चंद्र निषाद
प्लाट नंबर-19ए, प्रीतिनगर, फैजुल्लागंज द्वितीय, लखनऊ
अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के दायरे में देश के सैन्य परमाणु संयंत्र कतई नहीं आएंगे। एजेंसी के साथ प्रस्तावित समझौता केवल असैन्य नाभिकीय ऊर्जा संयंत्रों के लिए ही लागू होगा। अत: भविष्य में 22 में से 14 परमाणु संयंत्रों को संयुक्त राष्ट्र की परमाणु एजेंसी की निगरानी के लिए खोल देगा।

पहला संयंत्र 2009 में खोला जाएगा जबकि सभी 2014 तक खोल दिए जाएंगे। इसमें कोई शक नहीं कि भारत जैसे विकासशील देश के लिए परमाणु ऊर्जा कारोबार मील का पत्थर साबित होगा। एनएसजी के फैसले से परमाणु परीक्षण पर लगी रोक हट गई है और अब देश के सभी परमाणु बिजली संयंत्र अपनी पूरी क्षमता से उत्पादन कर सकेंगे।

जनता के लिए बंधन है यह करार
शिव चरण आमेटा
प्रेस कॉम्पलेक्स, भोपाल, मध्य प्रदेश
आज के इस दौर में किसी भी देश के सामने जो समस्या सबसे ज्यादा पड़ी है वह है ऊर्जा संबंधी अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने की। भारत के सामने यह समस्या कोई नई बात नहीं है। परमाणु समझौते को लेकर एक डर है कि क्या हमारी स्वतंत्रता और संप्रभुता को तो कोई खतरा नहीं है?

वहीं दूसरी तरफ इस मामले में पारदर्शिता का होना जरूरी था तो क्यों देश के नागरिकों को इस संबंध में वंचित रखा गया है? यह करार देश की जनता पर पड़े हुए उस बंधन समान है, जिसे लेकर न कोई उड़ सकता है और न ही कोई इस जाल को काट सकता है।

पुरस्कृत पत्रहितों के लिए सतर्क रहना होगाआशीष शाह
कार्यकारी उपाध्यक्ष,
जैन इंटरनेशनल ट्रेड आर्गनाइजेशन (जीतो),मुंबई
भारत और अमेरिका के बीच परमाणु समझौता एक ऐतिहासिक उपलब्धि जरूर है लेकिन अमेरिका की नीतियों को देखते हुए हमें यह ध्यान रखना होगा कि कहीं हमारे हाथ न कट जाए। भारतीय संसद में जानकारी दी गई थी कि 123 समझौते के तहत ईंधन सप्लाई सुनिश्चित करना अमेरिका की जिम्मेदारी होगी, लेकिन अमेरिकी कांग्रेस में बुश कुछ अलग ही बयान दे रहे हैं, इससे उनका दोमुंहापन सामने आता है।

ऐसे में परमाणु करार जैसे संवेदनशील मुद्दे की हर बात को शीशे की तरह साफ कर लेनी होगी, जिससे भविष्य में किसी तरह की परेशानी न उठानी पड़े। क्योंकि अमेरिका की नीति शुरू से ही विकासशील देशों को नीचा दिखाने का रही है, इसलिए भारत जो भी कदम उठाए देशहित को ध्यान में रखे।

अन्य सर्वश्रेष्ठ पत्रगांवों को रोशन करेगा यह करार
भरत कुमार जैन
अध्यक्ष, फोरम ऑफ एग्रो इण्डस्ट्रीज, 14 जानकी नगर अनेक्स-1, इंदौर, मप्र
करार देश के छल नहीं बल्कि ऐतिहासिक उपलब्धि है, देश की जनता की समृध्दि का द्वार और ग्रामीण अंधेरे क्षेत्रों को रोशन करने का महत्वपूर्ण समझौता है, जो 10-15 साल में भारत की तस्वीर ही बदल देगा। अगले दशक में घरेलू बाजार में एनपीसीआईएल, जो एकमात्र अधिकृत परमाणु बिजली निर्माता कंपनी है, वह 60 हजार करोड़ के निवेश की योजना बना रही है और 2018 तक 10 हजार मेगावाट परमाणु बिजली का अतिरिक्त उत्पादन कर देगी तथा देश की कई बड़ी कंपनियां भी लाइन में लगी हैं, आणविक ऊर्जा उत्पादन के लिए।

प्रचार ज्यादा, सच्चाई उलटधीरज कुमार राय
भटनी, देवरिया, उत्तर प्रदेश
करार इस देश के आमजन के लिए उतना फायदेमंद नहीं है, जितना सरकार प्रचारित कर रही है। इसके नफा-नुकसान पर नजर दौड़ाई जाए तो पाते हैं कि इसका सबसे अधिक फायदा देश-विदेश की विभिन्न सेक्टर की लगभग 400 कंपनियों को ही होगा, जो अलग-अलग परियोजनाओं में काम करेंगी। इस करार के बाद जहां फार्मा क्षेत्र की कंपनियों को कच्चे माल की आपूर्ति में आसानी होगी वहीं रक्षा, आईटी और ऊर्जा क्षेत्र से जुड़ी कंपनियों का इसका सीधा लाभ मिलेगा। इसलिए करार का भारत के आम आदमी सरोकार नहीं है।

रणनीतिक योजना का हिस्सा करारसुधा प्रजापति
भोपाल, मध्य प्रदेश
आजादी पाने के लिए हमारे देश को डेढ़ सौ वर्षों तक समझौता करना पड़ा था। एक बार फिर हमें स्वयं को ऐसी स्थिति में नहीं धकेलना चाहिए। अमेरिका भारत को अपनी तकनीक तो दे रहा है साथ ही तेल पर हमारी निर्भरता भी खत्म हो जाएगी। लेकिन सोचने वाली बात है कि अमेरिका भारत के साथ परमाणु समझौते के लिए इतना व्याकुल क्यों है? निश्चित ही इस करार में अमेरिका का भी कुछ न कुछ फायदा निहित होगा। यह करार अमेरिका की व्यापक रणनीतिक योजना का हिस्सा है।

करार अलादीन का चिराग हैबीकेष सिंह
व्याख्याता, इंजीनियरिंग कॉलेज बीकानेर,राजस्थान
इस परमाणु करार से भारत का 1974 से जारी 34 वर्षों का वनवास समाप्त होकर उसे 45 परमाणु क्लब के सदस्यों से ईंधन, ऊर्जा व तकनीक पाने के अवसर बढ़ेंगे। अरबों डॉल का विदेशी निवेश आएगा। जंग खाते व्यापार चक्र के नए पंख लग जाएंगे। साथ सुथरी पर्यावरण मित्र ऐसी ऊर्जा मिलेगी जो पेट्रोल मूल्यों के उतार-चढ़ाव तथा उत्पादक देशों पर निर्भरता समाप्त करेगी। अमेरिका के साथ सामरिक साझेदारी होने से उसको परमाणु शक्ति सम्पन्न राष्ट्र का दर्जा और सुरक्षा परिषद् में स्थाई सदस्यता का मार्ग साफ होगा।

बकौल विश्लेषक

करार से अमेरिका का पिछलग्गू नहीं बनेगा देशडॉ. आर. के. शिवपुरी
भौतिकी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय
वर्तमान में, हमारे पास बिजली की कुल क्षमता 130 मेगावाट है। भारत सरकार के इस पहल से अगले 10 सालों में कम से कम 20 हजार मेगावाट बिजली हमें और मिल जाएगी। फिलहाल पूरे देश में 230 हजार मेगावाट बिजली की आवश्यकता है। मालूम हो कि हमारे पास पूरी दुनिया का 25 फीसदी थोरियम उपलब्ध है। आगे आने वाले दिनों में परमाणु रिएक्टरों में थोरियम के इस्तेमाल पर भी रिसर्च जारी है।

इस समझौते के बाद हमें केवल यूरेनियम ही नहीं बल्कि वे सारी तकनीकें भी मिल जाएंगी, जिससे देश का आमजन लाभांवित होगा। लिहाजा, देश तकनीकी रूप में काफी मजबूत हो जाएगा। इसके अलावा, हमें एक ऐसी केमिकल्स भी मिल जाएंगे, जिसका इस्तेमाल सेना, इलेक्ट्रानिक चिप और सड़के आदि बुनियादी ढांचाओं को मजबूत करने में किया जाएगा।

यही नहीं हमें अमेरिका से कुछ ऐसे इलेक्ट्रॉनिक्स चिस भी मिल जाएंगी, जिसका इस्तेमाल स्पेस में किया जा सकता है। किसी भी राष्ट्र के संपूर्ण विकास के लिए ऊर्जा का महत्वपूर्ण योगदान होता है और यह संधि देश में ऊर्जा की कमी को पाटने में काफी मददगार साबित होगी।

जो लोग यह कहते हैं कि इस समझौते के बाद भारत अमेरिका का पिछल्लगू बन जाएगा, बिल्कुल बेबुनियाद बात हैं। चीन ने भी इस तरह की एक संधि अमेरिका के साथ की है तो क्या वह अमेरिका का पिछल्लगू बन गया है, बिल्कुल नहीं। हमारी सेना की शक्ति बरकरार रहेगी।
बातचीत: पवन कुमार सिन्हाअमेरिका भारत के रूप में एक लठैत तैयार कर रहा हैरमेश दीक्षित
प्रोफेसर, राजनीति शास्त्र विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय
परमाणु करार देश के हित में कतई नहीं है। हालांकि मैं राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी से जुड़ा हूं, जिसने करार के पक्ष मे मतदान किया है पर मेरा मत भिन्न है। देश को यह बताना चाहिए कि करार से कितनी बिजली मिलेगी और कब तक। आखिरकार हम अपनी संप्रभुता गिरवी रख रहे हैं तो देशवासियों को यह जानने का हक है कि करार से कितनी बिजली मिलने वाली है।

अभी हम परमाणु ऊर्जा से अपनी जरूरत का 3-4 फीसदी बिजली बना रहे हैं और करार होने के बाद 2020 तक 10 फीसदी भी बिजली परमाणु ईंधन से नहीं बना सकेंगे। समझौते के समर्थक भी 15 फीसदी की ही बात कर रहे हैं पर यह नहीं बता रहे हैं कि बाकी का 85 फीसदी कहां से आएगी। कहा यह जा रहा है कि भारत को बिजली की जरूरत है और परेशान है अमेरिका। डाभोल का हाल देख चुके हैं।

यही अटल बिहारी बाजपेयी की 13 दिन की सरकार जब बनी थी तो उसने पहला काम इस परियोजना पर दस्तखत करने का किया था। आज ये करार का विरोध कर रहे हैं। कहां है वो बिजली और वो परियोजना। देश के लोगों को हाइड एक्ट के बारे में बताया ही नहीं गया जिसका धारा 1.06 कहता है कि भारत को अमेरिकी हितों के हिसाब से चिंता करनी होगी।

सीधी बात है अमेरिका एक जमींदार है और वो इस क्षेत्र के लिए भारत के रूप में एक लठैत तैयार कर रहा है। यूरोप के देश क्यों नहीं परमाणु ईंधन से बिजली बना रहे हैं। हमारे यहां तो धूप, पानी और कोयला सब कुछ है। एक तरफ लोग ईंधन का रोना रो रहे हैं और परमाणु करार की वकालत कर रहे हैं। करार देश हित में नहीं बल्कि छल है।
बातचीत:सिध्दार्थ कलहंस

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